महानिर्वाणी अखाड़े में दो दिव्य भालों की पूजा
हरिद्वार, 20 अक्टूबर । देशभर में जहां दशहरे पर भगवान राम की रावण पर विजय का उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है, वहीं धर्मनगरी हरिद्वार के कनखल स्थित श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े में सदियों पुरानी एक अनोखी और गौरवशाली परंपरा निभाई गई। यहां विजयदशमी के पावन अवसर पर शस्त्र पूजन के दौरान दो विशेष भालों की सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश की देवता के रूप में पूजा-अर्चना की गई।
मंगलवार को अखाड़े के रमता पंच के नागा संन्यासियों ने वैदिक मंत्रोच्चार और पूरे विधि-विधान के साथ इन दोनों भालों का अभिषेक किया। पंडितों द्वारा मंत्र पढ़े गए और अखाड़े में संरक्षित अन्य प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों तथा आधुनिक हथियारों का भी पूजन किया गया। दशनामी संन्यासी परंपरा में विजयदशमी पर शस्त्र पूजन को केवल एक रस्म नहीं, बल्कि शक्ति, संकल्प और धर्मरक्षा का प्रतीक माना जाता है।
महानिर्वाणी अखाड़े के संतों के अनुसार, ये दोनों कोई सामान्य भाले नहीं हैं। इन्हें अखाड़े के इष्ट देव के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि ये भाले अखाड़े की शक्ति और विजय के प्रतीक हैं। सदियों से इनकी पूजा चली आ रही है और इन्हें अखाड़े की धरोहर माना जाता है।
इन भालों की सबसे बड़ी विशेषता इनका कुंभ मेले से जुड़ाव है। जब कुंभ मेले में महानिर्वाणी अखाड़े की भव्य पेशवाई निकलती है, तो इन दोनों भालों को सबसे आगे, पालकी में सजाकर ले जाया जाता है। उन्हें देवताओं की तरह सम्मान दिया जाता है।
अखाड़े की सबसे अनोखी परंपरा शाही स्नान से जुड़ी है। कुंभ में शाही स्नान के दिन गंगा में सबसे पहले डुबकी इन दोनों भालों को ही लगवाई जाती है। अखाड़े की परंपरा के अनुसार, सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश के स्नान के बाद ही आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, श्रीमहंत और हजारों नागा संन्यासियों की जमात गंगा में स्नान करती है। यही कारण है कि दशहरे पर इनकी पूजा का विशेष महत्व है।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रवींद्र पुरी महाराज ने बताया कि यह परंपरा आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से जुड़ी है।
आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए संन्यासियों को केवल शास्त्रों का ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि शस्त्र विद्या में भी निपुण बनाया। उस समय आक्रांताओं से मंदिरों और मठों की रक्षा के लिए नागा संन्यासियों ने शस्त्र धारण किए।
रवींद्र पुरी महाराज ने बताया कि काशी विश्वनाथ मंदिर की रक्षा के लिए महानिर्वाणी अखाड़े के सैकड़ों नागा संन्यासियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था। उनका त्याग इतिहास में अमर है। शस्त्र पूजन उसी बलिदान और शौर्य की याद दिलाता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजन का विशेष स्थान है। देवी-देवताओं के हाथों में शस्त्र शक्ति का ही प्रतीक हैं। विजयदशमी पर शस्त्र पूजन हमें सत्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर महंत कैलाश भारती, श्रीमहंत मनोज गिरि, महंत विनोद गिरि उर्फ हनुमान बाबा, स्वामी ज्ञान भारती सहित अखाड़े के अनेक संत-महंत उपस्थित रहे।
