मायावती की बिहार एंट्री से NDA-INDI गठबंधन में उबाल, BSP बनेगी खेल बदलने वाली ताकत?
दिल्ली में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने 18 मई को महत्वपूर्ण ऐलान करते हुए बिहार की राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दिया है। उन्होंने घोषणा की कि उनकी पार्टी इस बार बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। रामजी गौतम, जो नेशनल को-ऑर्डिनेटर और राज्यसभा सांसद हैं, और बिहार प्रभारी अनिल कुमार को मजबूत प्रत्याशियों के चयन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। बसपा इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत से उतरने की योजना बना रही है, खासकर यूपी बॉर्डर से सटे जिलों जैसे बक्सर, कैमूर और रोहतास पर, जहां परंपरागत रूप से उनका दलित वोट बैंक मौजूद है। इन क्षेत्रों में 25-30 सीटों पर उनकी नजर है।
बिहार में बसपा का चुनावी मिशन अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि पार्टी वर्तमान में राजनीतिक रूप से कमजोर दौर से गुजर रही है। उत्तर प्रदेश, जो बसपा की जन्मभूमि है, वहां पार्टी के पास महज एक विधायक बचा है और लोकसभा में उसकी नुमाइंदगी लगभग खत्म हो चुकी है। यहाँ तक कि पिछले चुनाव में बसपा का वोट शेयर गिरकर 9.35 प्रतिशत रह गया है। यही कारण है कि Bihar में चुनाव जीतना पार्टी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति को मजबूत करने का एक मौक़ा है। बिहार की सीमाएं यूपी से सटी हुई हैं, और यहाँ दलित मतदाता लगभग 16 प्रतिशत हैं, जिसमें जाटव समुदाय का हिस्सा करीब 4.5 प्रतिशत है। 2000 के बाद से, बसपा बिहार विधानसभा चुनावों में कुछ साक्षात्कारित सफलताएं हासिल कर चुकी है, जिसमें 2010 और 2015 को छोड़कर पार्टी ने अपना खाता खोला है।
हालांकि, बिहार में राजनीतिक हालात बदलते रहे हैं। पिछले उपचुनावों का परिणाम भले ही एनडीए के पक्ष में गया हो, लेकिन बसपा ने कुछ सीटों पर अच्छी मेहनत की थी। पार्टी का उम्मीदवार सतीश यादव, रामगढ़ सीट पर भाजपा के अशोक सिंह के मुकाबले में आंकी गई बढ़त को बनाए रखते हुए, केवल 1362 वोटों से हार गए। इससे स्पष्ट होता है कि बसपा के पास हारने के बावजूद अपनी स्थिति मजबूत करने की क्षमता है। लोकसभा 2024 में बसपा को बिहार में 7.44 लाख वोट मिले थे, और पार्टी वर्तमान में 10-15 सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है, खासकर यदि एनडीए और इंडी गठबंधन में टक्कर आई।
बिहार में बसपा की रणनीति पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की पिच पर चुनाव लड़ने की है। अनिल चौधरी को प्रदेश प्रभारी बनाकर, जो कुर्मी जाति से आते हैं, उन्होंने इस समुदाय को जोड़ने की कोशिश की है। इसके अलावा, मुस्लिम मतदाता भी चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हालांकि, दलित मतदाताओं को लेकर पार्टी को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कई दलित उपजातियां, जैसे दुसाध (लोजपा) और महादलित वर्ग, पूर्व सीएम जीतन राम मांझी के समर्थन में हैं। इस स्थिति में, यदि बसपा अपनी रणनीतियों में सुधार करती है, तो वह अपने कोर वोटरों को पुनः अपने साथ जोड़ने में सफल हो सकती है।
आखिरकार, यह चुनाव आकाश आनंद के लिए भी एक अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है, जो पार्टी की नई नेतृत्व में हैं। यदि वह इस चुनाव में सफलता प्राप्त करते हैं, तो यह उन्हें बसपा का भविष्य का नेता साबित कर सकता है। हालांकि, पार्टी को अपनी आंतरिक कलह को सुलझाने की भी आवश्यकता होगी, ताकि वह बिहार में मजबूती के साथ प्रतिस्पर्धा कर सके। आदर्श और संगठनों के बीच तालमेल से ही बसपा को अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापिस पाने में मदद मिलेगी।