उत्तरप्रदेश की कोहबर और माते पूजा चित्र परंपरा पर तीन दिवसीय अंकन शिविर का समापन
भोपाल, 24 जून । लोक कला एवं पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में आयोजित उत्तरप्रदेश की कोहबर एवं माते पूजा चित्र परंपरा पर आधारित तीन दिवसीय अंकन शिविर का समापन हुआ।
यह शिविर 22 से 24 जून तक मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय और उत्तरप्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। शिविर का उद्देश्य उत्तरप्रदेश की समृद्ध लोक चित्रकला परंपराओं का संरक्षण, संवर्धन और प्रलेखन करना था।
शिविर में गोरखपुर की कलाकार कुमुद सिंह ने कोहबर चित्र परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि पूर्वांचल की कोहबर कला में विभिन्न प्रतीकों का अंकन सांस्कृतिक, दार्शनिक और मंगल भावनाओं से जुड़ा होता है। इसमें बांस को विशेष महत्व दिया जाता है। बांस को वंशवृद्धि, समृद्धि और सामाजिक निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।
अयोध्या की कलाकार दीपा सिंह ने अवधी लोक भित्ति चित्रकला के संबंध में बताया कि कोहबर कला विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर बनाई जाती है। इसमें प्राकृतिक रंगों जैसे गेरू, चावल का घोल, हल्दी, चूना, कुमकुम, सिंदूर और काजल का उपयोग किया जाता है। चित्रों में देवी-देवताओं, वनस्पतियों, पक्षियों और उर्वरता व समृद्धि से जुड़े प्रतीकों का अंकन किया जाता है।
उन्होंने बताया कि कोहबर चित्र केवल सजावट का माध्यम नहीं हैं, बल्कि पारिवारिक आस्था, संस्कृति और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना को व्यक्त करने वाली परंपरा हैं।
थारू जनजाति की कोहबर कला पर विशेष जानकारी
बलरामपुर क्षेत्र की थारू जनजाति में विवाह के अवसर पर घर की दीवारों पर कोहबर चित्र बनाने की परंपरा आज भी जीवित है। इस कला में प्राकृतिक रंगों और स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। हल्दी, गेरुआ, चावल का आटा और सिंदूर से बनाए गए चित्रों में हाथी, धान, वृक्ष, मछली और कमल जैसे प्रतीकों का अंकन किया जाता है।
इन प्रतीकों को शक्ति, समृद्धि, जीवन, शुभता और पारिवारिक कल्याण से जोड़कर देखा जाता है। थारू समुदाय की कुल देवी का चित्रण भी इस परंपरा में विशेष महत्व रखता है।
माते पूजा चित्र परंपरा से कराया परिचय
मथुरा की कलाकार सीमा मोरवाल ने ब्रज क्षेत्र की माते पूजा चित्र परंपरा के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि यह विवाह संस्कार से जुड़ी प्राचीन लोक परंपरा है, जिसमें महिलाएं घर की दीवारों और वस्त्रों पर प्राकृतिक रंगों से चित्रांकन करती हैं।
माते पूजा में सिंदूर, गेरू, खड़िया, चावल के घोल और हल्दी जैसे पारंपरिक रंगों का उपयोग किया जाता है। इसमें उर्वरता, सौभाग्य और मंगल जीवन की कामना से जुड़े प्रतीकों का चित्रण किया जाता है।
माते पूजा चित्रों में सोलह गुड़ियां, हाथ के थापे, गाय, पीपल, स्वास्तिक, सूर्य, चंद्रमा और मोर जैसे प्रतीकों का अंकन किया जाता है। ये प्रतीक प्रकृति, जीवन, समृद्धि और शुभता के भावों को दर्शाते हैं।
तीन दिवसीय इस शिविर के माध्यम से कलाकारों और कला प्रेमियों को उत्तरप्रदेश की लोक चित्र परंपराओं से परिचित कराया गया तथा इन पारंपरिक कलाओं के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई।