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प्रधानमंत्री मोदी डिग्री मामला: हाई कोर्ट ने डीयू से तीन हफ्ते में मांगी आपत्ति

नई दिल्ली, 10 फ़रवरी । दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री का खुलासा करने वाली याचिका केवल सनसनी पैदा करने के लिए दायर की गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की अध्यक्षता वाली बेंच ने दिल्ली विश्वविद्यालय को तीन हफ्ते में अपनी आपत्ति दाखिल करने को कहा। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान मेहता ने आपत्ति दाखिल करने के लिए और समय देने की मांग की। वो याचिका दाखिल करने में देरी और याचिका के गुणों पर जवाब दाखिल करेंगे। इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कहा कि अगर सॉलिसिटर जनरल कह रहे हैं कि वे जवाब दाखिल करेंगे तो कोर्ट को नोटिस जारी करना चाहिए। इसका मेहता ने विरोध करते हुए कहा कि वे इस मामले में पेश हो रहे हैं। नोटिस जारी करने के आदेश के जरिये वे सनसनी पैदा करना चाहते हैं। तब शादान फरासत ने कहा कि याचिका दायर करने में थोड़ा ही देर हुआ है जिसे कोर्ट माफ कर सकती है। इस पर मेहता सहमत नहीं हुए। उसके बाद कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय को तीन हफ्ते में आपत्ति दाखिल करने का निर्देश दिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने 12 नवंबर 2025 को कहा था कि सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाएं तय समय सीमा के बाद दाखिल की गई हैं। कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय को निर्देश दिया था कि वो देर से याचिकाएं दाखिल करने पर अपनी आपत्ति दाखिल करें। याचिका दायर करने वालों में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा और वकील मोहम्मद इरशाद शामिल हैं। इन याचिकाकर्ताओं ने सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती दी है।

जस्टिस सचिन दत्ता की बेंच ने 25 सितंबर, 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से दायर याचिका मंजूर करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को निरस्त कर दिया था। सिंगल बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालयने कहा था कि वो कोर्ट को डिग्री दिखा सकती है लेकिन किसी अजनबी को नहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि एक वैसे छात्र की डिग्री मांगी जा रही है जो आज देश का प्रधानमंत्री है। उन्होंने कहा था कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। विश्वविद्यालय हर साल का रजिस्टर मेंटेंन करती है। मेहता ने कहा था कि दिल्ली विश्वविद्यालय कोर्ट को डिग्री दिखा सकती है लेकिन किसी अजनबी को डिग्री नहीं दिखाई जा सकती है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि सूचना के अधिकार के तहत किसी छात्र को डिग्री देना निजी कार्य नहीं बल्कि एक सार्वजनिक कार्य है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कहा था कि सूचना के अधिकार कानून के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक प्राधिकार है। ऐसे में सूचना मांगने वाले की नीयत के आधार पर किसी की डिग्री की सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय ने इसे निजी जानकारी बताते हुए साझा करने से इनकार कर दिया था। विश्वविद्यालय के मुताबिक इससे कोई सार्वजनिक हित नहीं पूरा होता है। उसके बाद नीरज शर्मा ने केंद्रीय सूचना आयोग का रुख किया जिसने दिल्ली विश्वविद्यालय के सूचना अधिकारी मीनाक्षी सहाय पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। आयोग ने डिग्री से संबंधित जानकारी देने का भी आदेश दिया। केंद्रीय सूचना आयोग के इसी फैसले के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया था।

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