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इविवि संघटक संस्थान के कर्मचारी केंद्रीय विश्वविद्यालय के लाभों का दावा नहीं कर सकते : उच्च न्यायालय

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा, “केवल इस आधार पर कि संस्थान इलाहाबाद विश्वविद्यालय का घटक बन गया है, याचिकाकर्ताओं को सामान्य भविष्य निधि योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता है। क्योंकि यह केवल प्रासंगिक प्रावधानों के आधार पर दिया जाना है जो याचिकाकर्ताओं के पक्ष में वर्तमान मामले में लागू नहीं हैं। “

याची डाक्टर एस के पंत प्रोफेसर व अन्य जी.बी.पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के कर्मचारी थे, जो भारतीय सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत एक स्वायत्तशासी संस्थान है। वर्ष 2005 में, जब इविवि को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया, तो जी.बी.पंत संस्थान को एक घटक संस्थान के रूप में अपनाया गया। इस आधार पर, याचिका कर्ताओं ने केंद्रीय विश्वविद्यालय कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों का दावा किया। इसमें सामान्य भविष्य निधि योजना के स्थान पर अंशदायी भविष्य निधि योजना लागू करना भी शामिल था। हालांकि, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उनकी मांग को अस्वीकार कर दिया था। इससे व्यथित होकर, याचिका कर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

न्यायालय ने कहा कि एक स्वायत्तशासी संस्था द्वारा केन्द्रीय विश्वविद्यालय का अंग बनने से सामान्य भविष्य निधि योजना के आवेदन की अनुमति नहीं मिलेगी। न्यायालय ने कहा कि विचाराधीन संस्थान स्वायत्तशासी है और इसका वित्तपोषण इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अलग है। उन्होंने प्रियंकर उपाध्याय बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त कर्मचारियों द्वारा उठाए गए इसी तरह के दावे को खारिज कर दिया गया था।

इसके अलावा, न्यायालय ने महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य बनाम भगवान एवं अन्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में, न्यायालयों को वित्तीय निहितार्थ वाले लाभ प्रदान करने में सावधानी बरतनी चाहिए। भगवान मामले में न्यायालय ने कहा, “कर्मचारियों को कुछ लाभ दिए जाएं या नहीं, यह विशेषज्ञ निकाय और उपक्रमों पर छोड़ दिया जाना चाहिए और न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कुछ लाभ दिए जाने से व्यापक प्रभाव पड़ सकता है जिसके प्रतिकूल वित्तीय परिणाम हो सकते हैं। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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