कोविड ड्यूटी में जान गंवाने वाले एसआई की पत्नी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत, अनुग्रह राशि पर पुनर्विचार का आदेश
प्रयागराज, 22 जुलाई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को कोविड-19 ड्यूटी के दौरान संक्रमित होकर जान गंवाने वाले एक उप-निरीक्षक की पत्नी को बड़ी राहत देते हुए जिलाधिकारी, मुरादाबाद के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें अनुग्रह धनराशि की उनकी अर्जी खारिज कर दी गई थी।
याची उषा द्विवेदी के पति योगेंद्र प्रताप द्विवेदी थाना सिविल लाइंस, मुरादाबाद में कोरोना हेल्प डेस्क पर तैनात थे। ड्यूटी के दौरान वे कोविड-19 से संक्रमित हो गए और जांच में पॉजिटिव पाए जाने पर उन्हें जिला अस्पताल, मुरादाबाद के एल-2, एमसीएच विंग में भर्ती कराया गया, जहां 23 अप्रैल 2021 को उनकी मृत्यु हो गई।
पत्नी ने राज्य सरकार के शासनादेश के तहत 50 लाख रुपये अनुग्रह राशि के लिए आवेदन किया, लेकिन जिलाधिकारी ने 11 नवंबर 2021 के आदेश से इसे तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया। खारिज करने का कारण यह बताया गया कि मृतक की कोविड प्रबंधन ड्यूटी पर तैनाती संबंधी कोई सक्षम अधिकारी का आदेश पत्रावली पर उपलब्ध नहीं था।
राज्य के स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चूंकि मृतक की कोविड ड्यूटी पर तैनाती का कोई दस्तावेज समय दिए जाने के बावजूद प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए मात्र संक्रमण और मृत्यु के आधार पर अनुग्रह राशि नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने पाया कि याचिका के साथ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मुरादाबाद द्वारा जारी एक प्रमाण पत्र संलग्न है, जिसमें मृतक की कोविड ड्यूटी पर तैनाती की पुष्टि की गई है। यद्यपि यह पत्र जिलाधिकारी के आदेश के बाद का है, फिर भी 11 नवंबर 2021 की तिथि का एक अन्य ड्यूटी प्रमाण पत्र भी शासनादेश के प्रारूप के अनुसार मौजूद है, जिसमें मृतक की कोविड ड्यूटी की अवधि दर्शाई गई है।
अदालत ने कहा कि अनुग्रह राशि से संबंधित शासनादेश का उद्देश्य कल्याणकारी प्रकृति का है और चूंकि विभागाध्यक्ष/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का प्रमाण पत्र उपलब्ध है, इसलिए याचिकाकर्ता के दावे पर पुनर्विचार आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2021 के आदेश को रद्द करते हुए जिलाधिकारी, मुरादाबाद को निर्देश दिया कि वे वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय से ताजा टिप्पणी/दस्तावेज मंगवाकर, आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता के दावे पर पुनः विचार करें। याचिका बिना किसी हर्जाने के आदेश के साथ स्वीकार कर ली गई।