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Uttarakhand

जनजातीय क्षेत्रों में पतंजलि ने 1011 वनस्पतियों की पहचान कर बनाया इतिहास

हरिद्वार, 18 मई । उत्तराखंड के जनजातीय इलाकों में छिपे औषधीय खजाने को लेकर पतंजलि योगपीठ की पहल ने नई चर्चा शुरू कर दी है। अब तक राज्य सरकार के रिकॉर्ड में पूरे उत्तराखंड में लगभग 1300 औषधीय पौधों का उल्लेख मिलता है, लेकिन पतंजलि की शोध टीम ने केवल चार जनजातीय जिलों में सर्वे कर 1011 औषधीय पौधों की पहचान कर नया दावा पेश किया है। यही नहीं, अब पतंजलि के वैज्ञानिक और शोधकर्ता राज्य के सभी 13 जिलों में विस्तृत सर्वेक्षण में जुटे हैं और प्रारंभिक संकेत बताते हैं कि उत्तराखंड में औषधीय वनस्पतियों की संख्या अब तक के सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है।

आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण के निर्देशन में यह व्यापक अध्ययन देहरादून, चमोली, पिथौरागढ़ और उधमसिंह नगर के जनजातीय क्षेत्रों में किया गया। शोधकर्ताओं की टीम गांव-गांव पहुंची और उन लोगों से बातचीत की, जिनके पास पीढ़ियों से पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान सुरक्षित है।

टीम ने 122 गांवों और 14 तहसीलों में जाकर सर्वे किया। इस दौरान 216 जनजातीय वैद्यों की पहचान की गई, जो अलग-अलग परम्परागत पद्धतियों से उपचार करते पाए गए। इन वैद्यों से बातचीत और अध्ययन के आधार पर 238 औषधीय पौधों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया गया। इनमें से कई वनस्पतियों की जानकारी पहली बार व्यवस्थित रूप से सामने आई है।

जनजातीय समाज की भागीदारी भी आई सामने

इस अध्ययन में उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियों की महत्वपूर्ण भागीदारी दर्ज की गई। इनमें जौनसारी समुदाय की हिस्सेदारी सबसे अधिक 39 प्रतिशत रही, जबकि भोटिया समुदाय 36 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा। इसके अलावा थारू समुदाय की भागीदारी 10 प्रतिशत, बुक्सा समुदाय की 9 प्रतिशत और वन राजी समुदाय की 6 प्रतिशत दर्ज की गई।

हर बीमारी के उपचार में इस्तेमाल हो रही थीं जड़ी-बूटियां

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जनजातीय समाज आज भी पारंपरिक औषधीय पद्धतियों से अनेक बीमारियों का उपचार कर रहा है। इनमें पेट दर्द, सर्दी-जुकाम, कान-गला रोग, बुखार, मधुमेह, चोट, दांत दर्द, डायरिया, मलेरिया-डेंगू, पाइल्स, उल्टी-दस्त, अस्थमा, मुंह के छाले, हड्डियां जोड़ने, किडनी की पथरी और आंखों की बीमारियां शामिल हैं। सबसे अधिक उपचार जोड़ों के दर्द और अर्थराइटिस के मामलों में देखने को मिला।

पतंजलि नेपहली बार जनजातीय समुदाय तक पहुँच बनाने के लिए इन परिवारों की जियो टैगिंग की। पतंजलि ने इन परिवारों को कृषि, व्यवसाय और रोजगार से जोड़ने की दिशा में भी कार्य किया। अन्नदाता एप के माध्यम से जनजातीय समुदायों को बिना बिचौलिये अपने उत्पाद बेचने का मंच उपलब्ध कराया गया।

पतंजलि द्वारा किए गए इस शोध को डॉक्यूमेंट ऑफ ट्राइबल हिल्स के रूप में संकलित किया गया है। यह पहली बार है जब जनजातीय चिकित्सा ज्ञान, जो अब तक केवल मौखिक परंपरा में सुरक्षित था, उसे वैज्ञानिक और लिखित स्वरूप में संरक्षित किया गया है।

आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि जनजातीय समाज के पास प्रकृति और औषधीय वनस्पतियों का जो पारंपरिक ज्ञान है, वह मानवता की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने कहा कि पतंजलि ने इस विलुप्त होती विरासत को वैज्ञानिक रूप से संरक्षित करने का अभियान शुरू किया है। आने वाले समय में राज्य की औषधीय वनस्पतियों को लेकर एक नई तस्वीर सामने आ सकती है।

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