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छोटी प्रकृति के मामले की जांच 13 साल बाद, हाईकोर्ट ने आरोप पत्र रद्द कर लगाया 50 हजार का हर्जाना

जयपुर, 10 अप्रैल । राजस्थान उच्‍च न्‍यायालय अपर लोक अभियोजक पद पर रहते हुए आरोप पत्र पेश करने की तिथियों का गलत उल्लेख करने और प्रकरणों की वार्षिक सत्यापन सूची पेश नहीं करने जैसे मामलों की जांच 13 साल बाद शुरू करने को गलत माना है। इसके साथ ही अदालत ने ऐसे मामलों में गंभीर कार्रवाई करने को भी गलत माना है। वहीं अदालत ने 16 साल पहले रिटायर हुए सरकारी वकील को राहत देते हुए उसके खिलाफ आरोप पत्र सहित अन्य कार्रवाई को रद्द करते हुए राज्य सरकार पर पचास हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने यह आदेश बृज बल्लभ शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अनुशासनिक अधिकारी ने पहले 17 सीसीए के तहत आरोप पत्र जारी किया, फिर उसके रिटायर होने से ठीक पहले उसे गंभीर आरोप में बदल दिया। यह कार्रवाई बदले की भावना को दर्शाता है। इस कारण याचिकाकर्ता को अपने रिटायर परिलाभों से वंचित होना पडा।

याचिका में अधिवक्ता हर्षवर्धन नंदवाना ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ साल 2008 में 16 सीसीए के तहत प्रारंभिक कार्रवाई आरंभ की गई। जिसके कहा गया कि साल 1994 में झालावाड़ के अकलेरा में एपीपी रहने के दौरान उन्होंने चालान पेश करने की तिथियों का रजिस्टर में गलत उल्लेख करने सहित इससे जुडी अन्य गलतियां की। वहीं मई, 2010 में उसे नोटिस जारी कर जांच को 17 सीसीए में बदल दिया। इसके बाद अगस्त माह में याचिकाकर्ता रिटायर हो गया। याचिका में कहा गया कि यह कार्रवाई बदले की भावना से की गई थी। जो आरोप उस पर लगाए गए थे, वह काम करना उसका दायित्व ही नहीं था। इन कामों की जिम्मेदारी कार्यालय के क्लर्क की थी। जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता के आरोप पत्र सहित अन्य कार्रवाई को रद्द करते हुए राज्य सरकार पर हर्जाना लगाया है।

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