गोबर गैस से जल रहे चूल्हे: औरैया के परवाह गांव ने पेश की आत्मनिर्भरता की मिसाल
औरैया, 16 मार्च (हि. स.) । उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद में भाग्यनगर ब्लॉक के ग्राम परवाह में ग्रामीणों ने आत्मनिर्भरता की एक अनोखी मिसाल पेश की है। देश के कई हिस्सों में जहां लोग एलपीजी गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई देते हैं, वहीं इस गांव के कई परिवार वर्षों से गोबर गैस का उत्पादन कर अपनी रसोई चला रहे हैं। गांव के लोगों ने स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिससे उन्हें गैस की कमी या बढ़ती कीमतों की चिंता नहीं रहती।
ग्रामीणों के अनुसार गांव में ही गोबर से गैस तैयार करने की व्यवस्था की गई है। इस गैस का उपयोग रोजमर्रा के भोजन बनाने में किया जाता है। इससे न केवल रसोई का काम आसान हो गया है, बल्कि आर्थिक रूप से भी यह काफी किफायती साबित हो रहा है। गांव के लोगों का कहना है कि यदि गोबर गैस प्लांट की समय-समय पर सही तरीके से देखभाल की जाए, तो यह लंबे समय तक पर्याप्त गैस उपलब्ध कराता है।
गोबर गैस के इस्तेमाल से चूल्हे के धुएं से भी राहत मिलती है, जिससे रसोई का वातावरण साफ और स्वस्थ रहता है। साथ ही महिलाओं को धुएं से होने वाली परेशानियों से भी छुटकारा मिला है। ग्रामीण बताते हैं कि इस पहल की शुरुआत करीब दस वर्ष पहले गांव के कुछ किसानों ने की थी। उन्होंने अपने घरों में भूमिगत टैंक बनाकर मवेशियों के गोबर से गैस तैयार करने का प्रयोग शुरू किया था।
शुरुआत में यह प्रयोग सीमित परिवारों तक ही था, लेकिन जब इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए तो धीरे-धीरे अन्य ग्रामीण भी इससे जुड़ते चले गए। वर्तमान समय में करीब 60 परिवारों की आबादी वाले इस गांव में लगभग 20 गोबर गैस प्लांट स्थापित हो चुके हैं, जिनसे कई घरों के चूल्हे जल रहे हैं।
गोबर गैस से निकलने वाला अवशेष भी बेकार नहीं जाता। इसका उपयोग खेतों में जैविक खाद के रूप में किया जा रहा है, जिससे फसलों की पैदावार में भी सुधार हो रहा है और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो रही है।
ग्रामीण रामआसरे ने बताया कि वह पिछले दस वर्षों से गोबर गैस का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी कि कृषि विज्ञान केंद्र और गेल की ओर से गांव में ये प्लांट लगाए गए थे। उनके अनुसार तीन तसला गोबर से दो समय का भोजन आसानी से बन जाता है।
वहीं ग्रामीण रामसखी ने बताया कि शुरुआत में इसमें थोड़ी मेहनत जरूर लगती है, लेकिन एलपीजी गैस की समस्या के समय यह सबसे बेहतर विकल्प साबित होता है। अन्य ग्रामीणों का कहना है कि यदि इसी तरह गांव-गांव में गोबर गैस प्लांट लगाए जाएं, तो ईंधन की समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है और पर्यावरण भी स्वच्छ बना रहेगा।
ग्रामीणों की यह पहल न केवल आत्मनिर्भरता का उदाहरण है, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक प्रेरणादायक कदम साबित हो रही है।