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गैंगस्टर लॉरेंस इंटरव्यू केस: छह पुलिसकर्मी पालीग्राफ टेस्ट से कतराए, मोहालि अदालत में रिकॉर्ड पेश होगा!

गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के पुलिस कस्टडी में हुए टीवी इंटरव्यू से संबंधित मामले में नया मोड़ सामने आया है। जिस मामले की खोजबीन कर रही पंजाब एंड हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा गठित एसआईटी ने अब तक कई चरणों को पार किया है। हालांकि, हाल में सामने आई जानकारी ने पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है। पुलिसकर्मियों ने जिनका नाम इस सबंध में लिया गया था, पॉलीग्राफ टेस्ट कराने के लिए पहले सहमति देने के बाद अब पीछे हट गए हैं। मोहाली की जिला अदालत में इन पुलिसकर्मियों ने एक एप्लीकेशन दायर की है, जिसमें उन्होंने यह आरोप लगाया है कि उन्हें परीक्षण कराने के लिए दबाव डाला गया था। यह कदम अदालत द्वारा पॉलीग्राफ टेस्ट पर रोक लगाने का कारण बना है।

आज इस मुद्दे पर पुनः सुनवाई होगी, जिसमें पुलिस अधिकारी भी अदालत में उपस्थित रहेंगे। उस सुनवाई में वे संबंधित रिकॉर्ड भी पेश करेंगे। यह दिखाता है कि अदालत मामले के प्रति गंभीर है और किसी प्रकार की शिथिलता बरतने का इरादा नहीं रखती है। वकील सुल्तान सिंह संघा ने इस मामले में अपने मुवक्किलों की अदालत में पेश होने के समय की स्पष्ट जानकारी दी है, जिसमें कोई वकील नहीं था। इस दावे के अनुसार, एडीजीपी रैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी के चलते पुलिसकर्मियों ने दबाव में आकर पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए सहमति दी।

इससे पहले, ये पुलिसकर्मी – मुख्तियार सिंह, कॉन्स्टेबल सिमरनजीत सिंह, कॉन्स्टेबल हरप्रीत सिंह, कॉन्स्टेबल बलविंदर सिंह, कॉन्स्टेबल सतनाम सिंह और कॉन्स्टेबल अमृतपाल सिंह – इस टेस्ट से गुजरने के लिए राजी हो गए थे। लेकिन अब उनके वकील का कहना है कि इनमें से किसी ने भी बिना उचित कानूनी सलाह के सहमति नहीं दी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच एजेंसियों का मानना है कि उक्त इंटरव्यू के दौरान जेल में सुरक्षा व्यवस्था में आंतरिक मिलीभगत के संकेत हैं और पॉलीग्राफ टेस्ट इस बात को स्पष्ट करने में मदद कर सकता है कि क्या किसी पुलिसकर्मी या जेल स्टाफ ने लॉरेंस को मीडिया के संपर्क में लाने में मदद की थी।

इस मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए पंजाब सरकार भी सक्रिय हो गई है। हाईकोर्ट के दखल देने के बाद, डीएसपी गुरशेर सिंह संधू सहित छह अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया था। इन पुलिस अधिकारियों पर आरोप था कि उन्होंने लॉरेंस बिश्नोई को इंटरव्यू देने की अनुमति दी थी, जबकि वह सीआईए पुलिस स्टेशन खरड़ में बंद था। इस मामले में उच्च न्यायालय ने पुलिस के व्यवहार और उनके कार्यों की जांच की आवश्यकता महसूस की है।

लॉरेंस बिश्नोई की टीवी पर दी गई पहली इंटरव्यू में उसने सिद्धू मूसेवाला के हत्या की जिम्मेदारी ली थी, जो कि एक सनसनीखेज खुलासा था। इसके बाद उसके दूसरे इंटरव्यू के दौरान उसने जेल के अंदर से कॉल करने के सबूत भी पेश किए थे, जिससे यह साफ होता है कि जेल सुरक्षा प्रबंधन में कहीं न कहीं चूक हो रही है। लॉरेंस के अनुसार, जेल के गार्ड की कमी के चलते वह मोबाइल फोन का उपयोग करने में सफल रहा था। इस प्रकार का मामला न केवल पुलिस विभाग की छवि को प्रभावित करता है, बल्कि यह सुरक्षा की व्यापकता पर भी सवाल उठाता है। अब देखना यह होगा कि अदालत इस मामले में क्या निर्णय लेती है और क्या न्याय मौजूद है।

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