बिजली के निजीकरण पर बवाल: उपभोक्ताओं को महंगी बिजली, कर्मचारियों को नौकरी का खतरा!
उत्तर प्रदेश सरकार 42 जिलों की बिजली वितरण सेवा को निजी हाथों में सौंपने की योजना बना रही है, जिसका सीधा असर पूर्वांचल और दक्षिणांचल वितरण कंपनियों के 1.5 करोड़ उपभोक्ताओं पर होगा। इस कदम से करीब 75,000 नियमित और संविदा बिजली कर्मचारियों की नौकरियों के खतरे में होने की संभावना जताई जा रही है। सरकार का तर्क है कि निजीकरण से बिजली की उपलब्धता में सुधार होगा और उपभोक्ताओं को 24 घंटे बिजली दी जा सकेगी। इसके साथ ही, सरकारी खजाने में भी बचत का दावा किया जा रहा है, जिससे विकास कार्यों को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, इस निर्णय पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं, जैसे कि क्या वास्तव में निजीकरण से पूरे राज्य में बिजली की 24 घंटे की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी?
यूपी में बिजली निजीकरण का इतिहास काफी पुराना है। ग्रेटर नोएडा में 1993 और आगरा में 2010 में पहली बार बिजली वितरण को निजी हाथों में सौंपा गया था। मौजूदा समय में चंडीगढ़ का पूरा बिजली नेटवर्क भी निजी कंपनियों के हाथ में है। लेकिन ऐसा लगता है कि सुखद प्रभाव के बजाय उपभोक्ताओं पर इससे विपरीत प्रभाव पड़ा है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा के अनुसार, निजीकरण से बिजली आपूर्ति में लगातार सुधार होगा, जबकि कर्मचारी संगठनों ने इसकी तीखी आलोचना की है। विशेषकर चंडीगढ़ का उदाहरण देते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि वहां निजीकरण के बाद कई कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया।
इसके अतिरिक्त, ग्रेटर नोएडा और आगरा की बिजली वितरण व्यवस्था की वास्तविकता से यह भी स्पष्ट होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को काफी कम बिजली मिलती है। जहां औद्योगिक और व्यवसायिक क्षेत्रों को 24 घंटे बिजली की आपूर्ति की जाती है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को केवल 10-12 घंटे ही बिजली की आपूर्ति होती है। इस भेदभाव का मुख्य कारण उपभोक्ता शुल्क की प्रवृत्ति है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सब्सिडी भी नहीं दी जाती है। आगरा तथा कानपुर के उदाहरण बताते हैं कि निजीकरण के बाद बिजली की लागत में वृद्धि हुई है, जिससे उपभोक्ता पर अधिक बोझ पड़ा है।
निजीकरण के समर्थन में एक अन्य दावा यह भी है कि इससे बिजली चोरी और लाइन लॉस कम हो जाएगा। हालांकि, इस दावे को भी आंकड़ों के आधार पर जांचा जा रहा है। आगरा की कंपनी का एटी एंड सी लॉस दर 9.82 प्रतिशत है, जबकि कानपुर की कंपनी का 9.6 प्रतिशत है। जबकि निजीकरण से पहले दोनों कंपनियों का लाइन लॉस काफी अधिक था। इससे यह स्पष्ट होता है कि बिजली वितरण में सुधार के लिए केवल निजीकरण ही एकमात्र समाधान नहीं हो सकता।
राज्य सरकार अब चंडीगढ़ और अन्य राज्यों के निजीकरण के परिणामों पर भी गौर कर रही है। चंडीगढ़ की बिजली कंपनी ने मुनाफा कमाने के बाद भी निजीकरण के दौर में कर्मचारियों को निकालने का काम किया, जिससे सवाल उठते हैं कि क्या सरकार इसी तरह से उत्तर प्रदेश में भी आगे बढ़ेगी। इस विषय में उपभोक्ताओं और कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना जरूरी है, ताकि निजीकरण के नाम पर किसी के भविष्य के साथ समझौता न किया जाए।
इस प्रकार, उत्तर प्रदेश में बिजली वितरण के निजीकरण पर बहस जारी है। इससे जुड़े सभी सवालों और चिंताओं का सही समाधान ढूंढना आवश्यक है, ताकि उपभोक्ता और कर्मचारी दोनों के हित सुरक्षित रह सकें।