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आरडीजी खत्म होने पर कोर्ट जाएगी हिमाचल सरकार, वेतन-पेंशन पर असर की आशंका

शिमला, 08 फ़रवरी । केंद्र सरकार द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) समाप्त होने के फैसले को लेकर हिमाचल प्रदेश सरकार ने राजनीतिक लड़ाई के साथ-साथ कानूनी लड़ाई लड़ने की भी तैयारी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट किया है कि यदि जरूरत पड़ी तो राज्य सरकार इस मुद्दे पर अदालत का दरवाजा भी खटखटाएगी, क्योंकि आरडीजी बंद होने से प्रदेश की अर्थव्यवस्था, विकास योजनाओं और कर्मचारियों की सैलरी-पेंशन पर गंभीर असर पड़ सकता है।

रविवार को सचिवालय में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के बाद वित्त विभाग ने राज्य की वित्तीय स्थिति और आरडीजी समाप्त होने के प्रभावों पर विस्तृत प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों और मीडिया को बताया गया कि राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा अब तक आरडीजी से पूरा होता रहा है और इसके खत्म होने से संसाधनों का गंभीर संकट पैदा हो सकता है।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि आरडीजी समाप्त होना किसी एक सरकार का नहीं बल्कि प्रदेश की जनता के अधिकारों का मुद्दा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस विषय पर सभी दलों को साथ लेकर दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मिलने के लिए तैयार है। मुख्यमंत्री ने विपक्ष से भी अपील की कि इस मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर प्रदेश के हित में केंद्र सरकार के सामने हिमाचल की मजबूती से पैरवी करें। उन्होंने कहा कि विपक्ष के विधायकों को भी वित्त विभाग की प्रस्तुति में आमंत्रित किया गया था, लेकिन उनका शामिल न होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

वित्त विभाग की प्रस्तुति में बताया गया कि प्रदेश सरकार को हर साल लगभग 48 हजार करोड़ रुपये के खर्च की आवश्यकता होती है, जिसमें वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान, सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं शामिल हैं। सरकार अपने संसाधनों से करीब 42 हजार करोड़ रुपये जुटा लेती है, लेकिन इसके बावजूद लगभग 6 हजार करोड़ रुपये का संसाधन अंतर बना रहता है। अब तक यह अंतर काफी हद तक आरडीजी से पूरा होता था, लेकिन इसके समाप्त होने से विकास योजनाओं और अन्य खर्चों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों का राज्य की अर्थव्यवस्था और आगामी बजट पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश के बजट का लगभग 12.7 प्रतिशत हिस्सा आरडीजी से आता रहा है और देश में इसका दूसरा सबसे अधिक हिस्सा हिमाचल को मिलता था, इसलिए इसका असर अन्य राज्यों की तुलना में यहां अधिक पड़ेगा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद राज्य के कर संग्रह की वृद्धि दर घटकर लगभग 8 प्रतिशत रह गई है, जबकि पहले यह 13 से 14 प्रतिशत तक होती थी, जिससे भी वित्तीय स्थिति प्रभावित हुई है।

प्रस्तुति में यह भी बताया गया कि वर्ष 2021 से 2026 की अवधि के लिए राज्य की कुल आय 90,760 करोड़ रुपये और व्यय 1,70,930 करोड़ रुपये आंका गया था। इस बड़े अंतर की भरपाई टैक्स डिवॉल्यूशन, आरडीजी और अन्य अनुदानों से की गई थी। अब आरडीजी समाप्त होने के कारण राज्य के सामने संसाधनों का संकट और गहरा सकता है। वित्त विभाग के अधिकारियों ने कहा कि राजस्व बढ़ाने और खर्च घटाने के उपाय तुरंत लागू करना संभव नहीं है, इसलिए निकट भविष्य में आरडीजी का विकल्प उपलब्ध नहीं है।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि प्रदेश सरकार लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना संसाधन बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है और राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रयास जारी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जिन बिजली परियोजनाओं ने अपना ऋण चुका दिया है, उनमें राज्य को अधिक रॉयल्टी मिलनी चाहिए और जिन परियोजनाओं का संचालन 40 वर्ष पूरा कर चुका है, उन्हें राज्य को वापस सौंपने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अलावा, भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड से बकाया राशि और शानन पावर प्रोजेक्ट से जुड़े मामलों में भी राज्य सरकार कानूनी लड़ाई लड़ रही है।

मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को आश्वासन दिया कि सरकार कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और जनकल्याणकारी योजनाओं को प्रभावित नहीं होने देगी, लेकिन आरडीजी समाप्त होने से विकास परियोजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार हर संभव कदम उठाएगी और अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।

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