‘प्यार वासना नहीं है…’ उच्च न्यायालय ने नाबालिग से विवाह के बाद पॉक्सो की कार्यवाही निरस्त करते हुए की टिप्पणी
नैनीताल, 25 फ़रवरी । उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में नाबालिग किशोरी से सहमति से बने वैवाहिक संबंध के प्रकरण में पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत दर्ज अभियोग की कार्यवाही निरस्त कर दी है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि “प्यार, वासना नहीं है” और विशिष्ट परिस्थितियों में दंडात्मक कार्यवाही जारी रखना न्यायोचित नहीं।
उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ के समक्ष प्रस्तुत याचिका में आरोपित युवक ने चंपावत की विशेष सत्र न्यायाधीश की अदालत में लंबित पॉक्सो अभियोग को निरस्त करने का अनुरोध किया था। न्यायालय ने अभिलेखों का परीक्षण करने के बापद पाया कि आरोपित और युवती अब विधिक रूप से विवाहित हैं और उनके वैवाहिक जीवन से एक संतान भी है। अभिलेखों के अनुसार दोनों का विवाह 12 मई 2023 को हुआ और 27 अक्टूबर 2025 को दंपति को पुत्र की प्राप्ति हुई।
युवती ने न्यायालय के समक्ष स्पष्ट किया कि वह बिना किसी दबाव के अपने पति के साथ रह रही है और वैवाहिक जीवन जारी रखना चाहती है। राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने याचिका का विरोध किया। इसके बावजूद न्यायालय ने समग्र परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति में अभियोग की कार्यवाही जारी रखने से स्थापित पारिवारिक जीवन प्रभावित होगा और न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होगी।
न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि पॉक्सो अधिनियम एक कठोर विधिक प्रावधान है जिसका उद्देश्य 18 वर्ष से कम आयु के बालकों और किशोरियों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण देना है। किन्तु प्रत्येक प्रकरण में तथ्यों और परिस्थितियों का न्यायिक परीक्षण आवश्यक है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने संबंधित कार्यवाही निरस्त कर दी।