पहले माता-पिता के मकान छोटे, मन बड़ा था, आज बच्चों केे मकान बडे़, मन छोटा है
कोटा, 18 जनवरी । दिव्य गौसेवक संत पं.कमल किशोरजी नागर ने कहा कि पहले माता-पिता के मकान छोटे थे लेकिन उनका मन बड़ा था। आज कलिकाल में पढे़-लिखे बच्चों के मकान तो बडे़ हैं लेकिन उनका मन बहुत छोटा है। इसीलिये कई परिवारों में मर्यादायें टूट रही हैं।
बकानी के पास थोबडिया खुर्द गांव में श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन पूज्य पं.नागर जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, तुम्हे जीवन में सुख-दुख दोनो का ज्ञान होना चाहिये। जब पांडवों पर सकंट आया तो परमात्मा ने उनकी पूरी मदद की थी। उन्होने कहा कि त्रेता युग में राज्याभिषेक होने पर प्रभू श्रीराम ने भजन, ध्यान करने के लिये रविवार की छुट्टी रखी थी लेकिन आज रविवार के दिन मौज मंस्ती और गलत भोजन कर रहे हैं। इस अवकाश के समय को भक्ति में लगाओ। श्रीकृष्ण-रूक्मणी प्रसंग सुनाते हुये उन्होंने कहा कि प्रभू श्रीकृष्ण के एक हाथ में चोट लगने पर जब रक्त बहने लगा तो महारानी रूक्मणी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर पट्टी बांध दी। रक्त बंद हो जाने पर पट्टी खोली तो श्रीकृष्ण बोले- इस पट्टी के धागे गिनकर रखना। समय आने पर यह ऋण चुकाना है।
पूज्य पं.नागरजी ने कहा कि महाभारत काल में दुस्साषन ने जैसे ही द्रौपदी की साड़ी खींची, श्रीकृष्ण ने उसकी साड़ी को और बड़ा कर दिया था। लेकिन दुर्भाग्य से आज भारतीय संस्कृति में युवतियां व महिलायें स्वयं कपडे़ हलके व छोटे पहनने लगी है, जिससे गलत घटनायें हो रही हैं। ऐसे हल्के वस्त्रों में भगवान भी आपकी रक्षा कैसे करेंगे। इसलिये अपने पहनावे को हमेशा मर्यादित रखो। उन्होंने मार्मिक भाव से कहा कि जिस पुत्र को मां ने 9 माह पेट में पालकर बड़ा किया है। उसे सिर्फ पेट पालने के लिये विदेश मत भेजना। अपनी आवश्यकता कम कर लेना पर पैसों के लिये बच्चों को विदेश जाने से रोको। आपकी अचानक तबीयत खराब हुई तो विदेश में रहने वाला पुत्र आपके पास नहीं आ सकेगा।
उन्होंने सीख दी कि जिनका समय खराब चल रहा हो, उसके पास तीन बार मिलने जाओ। यदि कोई बीमार है तो उसके हाल पूछने रोज दो बार जाओ। इससे भगवान आपका समय कभी खराब नहीं आने देगा। आप दूसरों के लिये अच्छे कार्य करते रहे तो परमात्मा पल-पल आपकी मदद करेगा। मालवा एवं हाड़ौती अंचल के हजारों भक्तों से खचाखच भरे विशाल पांडाल में हर्षोल्लास के साथ नंदोत्सव मनाया गया।
भागवत कथा के प्रारंभ में 11 वर्षीय बाल संत गोविंद ने कहा कि सांसारिक जीवन में सबसे बड़ा ब्रह्म बल है, उससे भी ज्यादा बड़ा है भक्ति का बल। धार्मिक आयोजनों में पाखंड का चढ़ावा न देकर उसे भक्ति मे ही लगायें। भक्ति आपको सारे दुखों से तार देगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह चोर को पकडकर पुलिस ही ले जाती है, उसी तरह सच्चे भक्त को यमदूत हाथ भी नहीं लगा सकता, उसके पास भक्ति बल होने से उसको लेने राम ही आयेंगे।