वंदे मातरम् : भारत की चेतना का स्वर
“वंदे मातरम्”; यह केवल दो शब्दों का उच्चारण नहीं है, यह तो भारत की आत्मा की अनंत गूंज है। यह उस भावना का प्रतीक है जो प्रत्येक भारतीय के हृदय में अपनी मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण का संचार करती है। इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लाखों देशवासियों को प्रेरित तो किया ही, आज भी यह भारत की राष्ट्रीय चेतना का अमर प्रतीक बना हुआ है।
रचना और उद्भव का इतिहास
वंदे मातरम् का उद्भव बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से हुआ। उन्होंने 7 नवम्बर 1875 को अपने ऐतिहासिक उपन्यास ‘आनंदमठ’ में इस गीत की रचना की। यह उपन्यास 1882 में प्रकाशित हुआ और शीघ्र ही पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। उस समय भारत अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। ऐसे वातावरण में यह गीत भारतीयों के लिए आशा और आत्मविश्वास का दीपक बना। वंदे मातरम् के शब्दों में निहित मातृभूमि की भक्ति ने भारतीयों के हृदय में स्वतंत्रता की चिंगारी जला दी। “सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्” जैसे शब्द भारत माता के प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्धि की छवि प्रस्तुत करते हैं, वहीं “वंदे मातरम्” का जयघोष मातृभूमि के चरणों में समर्पण का भाव जगाता है।
राष्ट्रीय चेतना का उदय
1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में जब पंडित रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे सुरों में पिरोकर राष्ट्रीय मंच से गाया, तो पूरा सभागार इस गीत की भावनाओं से अभिभूत हो उठा। यह वह क्षण था जब वंदे मातरम् राष्ट्रीय चेतना का स्वर बन गया। इसके बाद हर कांग्रेस अधिवेशन की शुरुआत इसी गीत से होने लगी। 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन की घोषणा की, तो इस गीत ने आंदोलन की आत्मा का रूप ले लिया। लाखों लोग सड़कों पर “वंदे मातरम्” के नारे लगाते हुए अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एकजुट हो गए। यह गीत अब केवल भक्ति या साहित्य नहीं, बल्कि विद्रोह और आत्मसम्मान की पुकार बन गया था।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
1906 के कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगीत का दर्जा मिला। इसके बाद यह हर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन का अभिन्न हिस्सा बन गया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने इसे राष्ट्रभक्ति का प्रतीक माना। गांधीजी ने कहा था, “वंदे मातरम् भारत के हृदय की पुकार है, जिसे कोई भी शक्ति दबा नहीं सकती।” क्रांतिकारी आंदोलनों में भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिखा। भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी वंदे मातरम् के उद्घोष के साथ फाँसी के तख्ते पर झूल गए। बंगाल में तो “वंदे मातरम् संप्रदाय” तक बना, जिसके सदस्य प्रभात फेरियों में यह गीत गाकर जनमानस में देशभक्ति का संचार करते थे।
अंग्रेजी शासन की प्रतिक्रिया
ब्रिटिश हुकूमत इस गीत के प्रभाव से भयभीत थी। उन्होंने कई बार इसके सार्वजनिक गायन पर प्रतिबंध लगाया। स्कूलों और कॉलेजों में “वंदे मातरम्” गाने वाले छात्रों को दंडित किया जाता था। देखने में आया कि यह प्रतिबंध जनता के जोश को दबा नहीं सके। गीत के प्रतिबंधित होने से इसकी लोकप्रियता और भी बढ़ी। यह ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध भारतीय एकता का प्रतीक बन गया।
स्वतंत्रता के बाद यह स्कूलों, सरकारी आयोजनों, खेलकूद समारोहों, संसद की बैठकों और कई सरकारी अवसरों पर गाया जाता है। जन भावना से जुड़ा यह गीत आज भी भारत की आत्मा की आवाज है। यह गीत हमें बार-बार स्मरण कराता है कि भारत की महानता उसकी विविधता, उसकी संस्कृति और उसकी मातृभूमि के प्रति प्रेम में निहित है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी पीढ़ियों को इस गीत का अर्थ, इतिहास और महत्व समझाएँ। ताकि भारत माता के प्रति निष्ठा, अनुशासन और त्याग की भावना सदैव प्रज्वलित रहे।वंदे मातरम्!
(लेखक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र प्रमुख हैं)