कोंटा में विविध स्वरूपों की झांकियां के साथ निकाली गई विसर्जन शोभायात्रा
उल्लेखनीय है कि कोंटा का शारदीय नवरात्रि महोत्सव अब केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था और एकता का प्रतीक बन गया है। लगभग सात दशक पूर्व जब कोंटा एक छोटा कस्बा था, तब पुरानी बस्ती (वार्ड 14 और 15, कोल्हुपारा) में श्रद्धालुओं ने इस परंपरा की नींव रखी थी। तब झांकी केवल तीन बैलगाड़ियों में निकलती थी और गांव के लोग अपनी मेहनत और भक्ति से माता रानी के स्वरूप को साकार करते थे। आज समय के साथ आधुनिकता आई है, लेकिन श्रद्धा वैसी ही अटल बनी हुई है। पिछले एक दशक से नगर में 11 ट्रैक्टरों पर सजी भव्य झांकियां निकलती हैं, जिन्हें देखने के लिए 100 किलोमीटर तक से श्रद्धालु आते हैं।
कोंटा का दशहरा अब केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि चार राज्यों की संस्कृति और भक्ति का मिलन स्थल बन चुका है। शबरी तट पर माता रानी के विसर्जन के क्षणों में जब आसमान में आतिशबाजी और नदी में दीपों की लौ एक साथ चमकी, तो दृश्य ऐसा था मानो पूरा कोंटा देवभूमि बन गया हो। यह पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और परंपरा की पहचान बन चुका है। 69 वर्षों से सतत जारी यह आयोजन बताता है कि, आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं और कोंटा की भूमि अब भी उतनी ही पवित्र है, जितनी उसके आरंभिक दिनों में थी।