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साकची रामलीला मंच पर कैकयी-मंथरा संवाद और राम का वनगमन प्रसंग का मंचन

रामलीला का शुरू उस प्रसंग से हुआ जब विवाह के बाद राम-सीता अयोध्या लौटते हैं। राजा दशरथ वृद्धावस्था का अनुभव करते हुए अपने गुरु वशिष्ठ से राज्य का दायित्व राम को सौंपने की इच्छा जताते हैं। वशिष्ठ इस पर सहमति देते हैं और राम के राज्याभिषेक की तैयारी शुरू हो जाती है।

इसी बीच कैकयी की दासी मंथरा को यह समाचार अप्रिय लगता है। वह जाकर कैकयी के मन में संशय और ईर्ष्या के बीज बोती है। मंथरा कैकयी को राजा दशरथ से प्राप्त दो वरदानों की याद दिलाती है और उसे राम के राज्याभिषेक को रोकने के लिए उकसाती है। मंथरा के बहकावे में आकर कैकयी दशरथ से दो वरदान मांगती है—पहला भरत को राजगद्दी सौंपने का और दूसरा राम को 14 वर्ष का वनवास देने का।

राजा दशरथ अपने वचनों से बंधे होने के कारण विवश हो जाते हैं और अंततः राम को वनवास का आदेश देना पड़ता है। इस प्रसंग में दशरथ की पीड़ा और कैकयी के हठ का भावनात्मक चित्रण किया गया। जब राम को आदेश मिलता है, तो वे इसे सौभाग्य मानकर पिता की आज्ञा का पालन करने का संकल्प लेते हैं। सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ वनगमन पर चलने का निश्चय करते हैं।

इसके बाद मंच पर केवट प्रसंग का जीवंत अभिनय किया गया। जब भगवान राम गंगा पार करने के लिए केवट निषादराज से निवेदन करते हैं, तो केवट बड़ी विनम्रता और भक्ति भाव से उनकी सेवा करने की इच्छा व्यक्त करता है। इस संवाद में केवट का भावुक अभिनय दर्शकों की आंखों को नम कर गया।

पूरे आयोजन में कलाकारों ने अपनी सशक्त अभिनय क्षमता से धार्मिक कथा को जीवंत कर दिया। संवाद, गीत-संगीत और मंच सज्जा ने रामलीला को और प्रभावशाली बना दिया। समिति की ओर से बताया गया कि आने वाले दिनों में लंका दहन और राम-रावण युद्ध जैसे प्रसंगों का मंचन किया जाएगा।

दर्शकों ने कहा कि साकची की रामलीला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक अद्भुत प्रयास भी है।

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