धर्मांतरण की बढ़ती समस्या
भारत एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक देश है, जहाँ धर्म की आज़ादी संविधान द्वारा सुनिश्चित है। लेकिन हाल ही में मतांतरण (धर्म परिवर्तन) की घटनाओं में वृद्धि और उनसे जुड़े विवादों ने इस विषय को हवा दे दी है। हाल के दिनों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जिसमें लोग अपने धर्म को छुपाकर या गलत तरीके से दूसरे धर्म के व्यक्तियों के साथ शादी करते हैं तथा शादी के बाद ऐसे दूसरे व्यक्ति को अपने धर्म में परिवर्तित करने के लिये मजबूर करते हैं।
पिछले दिनों राजस्थान विधानसभा में राजस्थान विधिविरुद्ध धर्म-संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2025 पारित कर दिया गया। अवैध रूप से धर्मान्तरण रोकने के लिए विधानसभा ने दूसरी बार विधेयक को मंजूरी दी है। वर्तमान विधेयक में जबरन व प्रलोभन देकर धर्मान्तरण कराने वाली संस्थाओं की अवैध सम्पत्तियों को बुल्डोजर से ध्वस्त करने का प्रावधान है। राजस्थान में किसी भी धर्म के व्यक्ति को अन्य धर्म में शादी करने या किसी अन्य उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करने के लिए कलेक्टर को 90 दिन पहले सूचना देकर स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन का घोषणा पत्र देना होगा। ऐसा नहीं करने पर जबरन धर्म परिवर्तन मानते हुए राजस्थान विधिविरुद्ध धर्म-संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2025 के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस विधेयक के आधार पर बनने वाला कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होगा लेकिन मूल धर्म में वापसी को धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा।
यह सही है कि संविधान ने हमें किसी भी धर्म को मानने का अधिकार दिया है। यह भी सही है कि स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन को क़ानूनन ग़लत नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन देखना यह होगा कि क्या वाक़ई धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हो रहा है? क्या किसी लोभ के कारण इस तरह की घटनाएँ नहीं हो रहीं? क्योंकि लोभ, भय, ब्लैकमेल आदि के कारण कराया जाने वाला धर्म परिवर्तन अपराध की श्रेणी में आता है। इसलिए इस पर राजनीति से हटकर सख़्त क़दम उठाने की ज़रूरत है। गौर करने वाली बात है कि केंद्रीय स्तर पर देश में मतांतरण को लेकर कोई कानून नहीं है। हालांकि पहले इसके लिए प्रयास हुए पर असफल ही रहा लेकिन अब देश के कई राज्यों में मतांतरण को रोकने के लिए कानून लागू किया गया है। लेकिन अच्छा तो यह होता कि मतांतरण पर कोई देशव्यापी केंद्रीय कानून होता।
मतांतरण और विदेशी फंडिंग: पंजाब जैसे राज्यों में काम कर रहे संगठनों ने वहां चल रहे मतांतरण पर चिंता व्यक्त की है। इसके कारण सामाजिक उपद्रव बन रहा है। वहां नशे के कारण युवाओं में परिणाम सामने आ रहे हैं। इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। इससे पीड़ित लोगों की सहायता कैसे की जाए, उसके लिए सरकार व पुलिस के साथ समन्वय बनाकर काम हो रहा है।
डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि जो मत-परिवर्तन लालच से किया जाता है, वह अनुचित है। गांधीजी मानते थे कि मतांतरण राष्ट्रांतरण है। कोर्ट भी मानता है कि यह राष्ट्र के लिए खतरनाक है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर केंद्र सरकार से इस पर कानून बनाने की बात कही जाती रही है लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जा सके हैं। हाल के समय में उच्चतम न्यायालय में अश्वनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रही पीठ के सामने भी इस मुद्दे पर कानून न होने तथा आर्थिक रुप से पिछड़े नागरिकों का अनैतिक तरीके से मतांतरण कराए जाने की बात कही गई।
विदित हो कि विदेशी फंडिंग के जरिए महिलाएं व बच्चे मतांतरण के अधिक शिकार हो रहे हैं इसलिए एक राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी कानून बनाया जाना चाहिए क्योंकि पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और भूटान में इसे लेकर कानून है। बावजूद इस दिशा में सरकार का आगे न बढ़ना समझ से परे है। इसका एक कारण वोटबैंक की राजनीति भी है जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इसका लंबे समय से विरोध करती आ रही है। यह विरोध राष्ट्र के लिए ठीक नहीं। निर्बल असहाय वर्ग को प्रलोभन देकर धर्मांतरण करवाया जाना सख्त कानून के अभाव में आम होता जा रहा है। अनेक राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर इस संबंध में कानून बनाए हुए हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सख्त कानून की आवश्यकता है। ऐसा कानून जिसमें संपूर्ण जांच के उपरांत ही धर्मांतरण को जिला प्रशासन द्वारा मंजूरी दिए जाने का प्रावधान हो।
देश में अगर धर्मांतरण निरोधक सख्त कानून होता तो देश के कोने-कोने में जबरन हो रहे धर्मांतरण की खबरें सामने नहीं आती। ये बात सही है कि कुछ राज्यों में इसे रोकने के लिए विधेयक पारित कर कानून जरूर बनाए गए हैं, किंतु केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं। बनाए गए कानून का कड़ाई से पालन होना भी उतना ही जरूरी है।
किसी की इच्छा के विरुद्ध जाकर उसे दूसरा धर्म अपनाने को मजबूर करना गंभीर अपराध है। आदिवासी बहुल क्षेत्र के लोगों को प्रलोभन देकर या जबरन धर्मांतरण करा दिया जाता है। न जाने कितने लोग ऐसे ही जबरन धर्मांतरण की बलि चढ़ा दिए जाते हैं। इन खबरों को देश के सामने लाने में मीडिया की अहम भूमिका होती है।
राज्यों की पहल: अनेक राज्यों ने धर्मांतरण के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून बनाये हैं। इसके बावजूद धर्मांतरण पर रोक नहीं लग सकी है। धर्मांतरण को लेकर सबसे पहले ओडिशा ने क़ानून बनाया। ओडिशा में धर्मांतरण विरोधी क़ानून सन् 1967 में लागू किया गया था। इसके बाद सन् 1968 में मध्य प्रदेश क़ानून बनाने वाला दूसरा राज्य बना। अरुणाचल प्रदेश में सन् 1978 में क़ानून बना। वहीं, गुजरात में सन् 2003 में क़ानून बना। समय की माँग के अनुसार अप्रैल, 2021 में पूर्व के क़ानून में संशोधन भी किया गया। इसके अलावा छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, कर्नाटक आदि राज्यों में क़ानून बने। झारखण्ड में सन् 2017 में धर्मांतरण पर क़ानून बना। सभी राज्यों के क़ानून में एक बात सामान्य है कि जबरन धर्म परिवर्तन के लिए ठोस कार्रवाई का प्रावधान किया गया। झारखण्ड, गुजरात, छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य ऐसे हैं, जहाँ धर्म परिवर्तन करने की सूचना ज़िलाधिकारी को देना अनिवार्य किया गया है।
गौरतलब है कि राज्य में जो क़ानून बने हैं, वह जबरन धर्म परिवर्तन पर कार्रवाई के हैं। जबकि स्थानीय लोगों का मानना है कि धर्म परिवर्तन कराने के लिए लोग एक मिशन के तहत इलाक़े में आते हैं। बाक़ायदा केंद्र बनाकर धर्म का प्रचार करते है। वे लोगों को लालच देकर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाते हैं। मतांतरण का मुद्दा भारत जैसे विविधता वाले देश में संवेदनशील है, इसलिए इस पर संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनाए जाने की जरूरत है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)