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शहीद का दर्जा क्यों नहीं? यूपी के शुभम द्विवेदी की मांग पर उठा सवाल!

कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए एक दुर्भाग्यपूर्ण आतंकवादी हमले में 27 पर्यटकों की जान गई, जिनमें कानपुर के रहने वाले शिवम द्विवेदी भी शामिल थे। इस घटना से देश भर में शोक की लहर दौड़ गई है, और शिवम की पत्नी ऐशन्या ने अपने पति को शहीद का दर्जा देने की मांग की है। लेकिन इस संदर्भ में कई महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं, जैसे कि शहीद का दर्जा किसे दिया जा सकता है और भारतीय सेना तथा सरकार इस संदर्भ में क्या नियम निर्धारित करती हैं।

शहीद शब्द का अर्थ फारसी भाषा से है, जिसका अर्थ साक्षी या बलिदानी होता है। यह शब्द मुख्य रूप से धार्मिक संघर्ष या सामाजिक आंदोलनों में उपयोग किया जाता है। भारतीय सशस्त्र बलों में इस शब्द का प्रयोग कभी-कभी किया जाता है, लेकिन इसे आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है। इसमें सेना के बलिदान को सही ढंग से व्यक्त करने के लिए विभिन्न विकल्प पेश किए गए हैं। हालांकि, इस विषय पर सरकार का स्पष्ट रुख है कि ‘शहीद’ शब्द का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है, और इसे इस्तेमाल करने की दिशा में कोई सुसंगत नीति नहीं है।

शिवम द्विवेदी की पत्नी ऐशन्या की मांग के संबंध में बताया गया है कि सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ‘शहीद’ का दर्जा केवल वहां दिया जाएगा जहां युद्ध या विशेष ऑपरेशनों के दौरान जान गंवाई गई हो। देश की सुरक्षा के लिए जान देने वाले सैनिकों को शहीद के बजाय ‘battle casualty’ या ‘operations casualty’ कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप, शिवम को ‘शहीद’ का दर्जा नहीं मिलेगा।

निश्चित रूप से, सरकारी नियम और दिशानिर्देश इस बात पर आधारित हैं कि किस प्रकार की स्थिति में हत्या या मृत्यु हुई है। कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों के परिवार को विशेष मुआवजे और सुविधाएं दी गई थीं, जैसे कि सरकारी नौकरी के लिए विशेष आरक्षण। लेकिन, शिवम की स्थिति में, जबकि वह छुट्टी पर यात्रा कर रहा था, उसके परिवार को विशेष पैकेज का लाभ नहीं मिलेगा।

ऐशन्या ने अपने पति की हत्या के बाद आतंकवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की भी मांग की है। उन्होंने कहा कि उन्हें आतंकियों का सफाया चाहिए, जिससे वे सुरक्षित महसूस कर सकें। उन्होंने कश्मीर यात्रा को लेकर अपने विचार व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि वे अब कभी कश्मीर जाने की योजना नहीं बनाना चाहतीं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या कश्मीर में इस प्रकार की घटनाओं में कमी आएगी और क्या सरकार ऐसे मामलों में प्रभावी कदम उठाने में सफल होगी।

अंत में, यह स्पष्ट है कि समुद्र की गहराई में होने वाले संवेदनाओं को शब्दों में कह पाना मुश्किल है। शहीद का दर्जा पाने के मामले में ऐशन्या की मांगों पर विचार करने की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान नियमों और व्यवस्था के तहत, उनकी आशाएं अनुचित प्रतीत होती हैं। वास्तव में, शासन और समाज को आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ा होना होगा, ताकि ऐसी घटनाएं फिर से न हों।

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