अखिलेश की नई चाल: ठाकुर वोट बैंक पर नजर, BJP-BSP की धड़कनें तेज!
समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने हाल ही में कई रणनीतियों को अपनाकर भाजपा को घेरने की योजना बनाई है। सितंबर 2024 में सुल्तानपुर लूटकांड के आरोपी मंगेश यादव के एनकाउंटर पर उन्होंने स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को ‘स्पेशल ठाकुर फोर्स’ करार दिया। इसी संदर्भ में उन्होंने चित्रकूट, जालौन, मैनपुरी, प्रयागराज और आगरा जैसे जिलों में पुलिस थानों में पिछड़े, दलित, और अल्पसंख्यक (PDA) के मुकाबले ज्यादा ठाकुर थानाध्यक्षों की तैनाती का आरोप लगाते हुए भाजपा को कटघरे में खड़ा किया है। सपा की यह नई रणनीति भाजपा को दलित और ओबीसी विरोधी साबित करने में मददगार साबित हो सकती है।
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने पहले बार PDA का नारा दिया था, लेकिन चुनाव के परिणाम उसके पक्ष में नहीं आए। इसके बाद, भाजपा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण दलों ने सपा के साथ गठबंधन तोड़ दिया। फिर भी, सपा ने अपने PDA प्लेटफॉर्म पर आधारित रणनीति को जारी रखा। अब सपा भाजपा और बसपा दोनों को चुनौती देने के लिए एक मज़बूत मोर्चा बनाने की कोशिश कर रही है। इस परिवर्तन का मुख्य कारण भाजपा की हिंदुत्व राजनीति और बसपा का निष्क्रिय रहना बताया गया है। सपा ने चाहा है कि वह अपने दलित वोट बैंक को फिर से मजबूत करे और इसकी दिशा में विशेष कदम उठाए जा रहे हैं।
इस रणनीति के तहत सपा ने आगरा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के विवाद से लेकर फैजाबाद की सीट पर अवधेश प्रसाद की जीत तक को अपने पक्ष में उपयोग किया है। सपा के अनुसार, इस बढ़ते दलित मुद्दे ने भाजपा के वोट बैंक को कमजोर करने में मदद की है। सपा ने पहले फैजाबाद और मेरठ की सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवारों को उतारा। उनकी यह योजना कामयाब रही, जिससे पार्टी ने कुछ सीटें हासिल कीं। इससे सपा ने दलित वोट बैंक को पुनः सहेजने की कोशिश की है, जिसका अब सफल परिणाम मिलता भी दिख रहा है।
हाल ही में, करणी सेना द्वारा दिए गए विवादास्पद बयानों ने राजनीति को और भी गर्म कर दिया है। रामजी लाल सुमन के बयान और क्षत्रिय समुदाय के प्रदर्शन ने इस पूरी स्थिति को ‘दलित बनाम ठाकुर’ बना दिया है। अखिलेश यादव ने इस मौजूदा परिस्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने दलित सांसदों के समर्थन में खड़े होकर उन्हें अपना साथ देने का संदेश दिया है। इसके साथ ही, सपा ने अपनी आलोचना को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशासनिक तंत्र पर भी निशाना साधा है।
इस प्रकार, यह साफ है कि सपा ने भाजपा के खिलाफ अपने रणनीतिक कदम उठाए हैं। विपक्षी दल बसपा, जो अपने मूल वोट बैंक की सुरक्षा की कोषिष में लगी है, भी इस स्थिति से प्रभावित हो रही है। मायावती ने अखिलेश की रणनीति को दलित विरोधी बताते हुए सपा पर हमला किया है। अंततः, उत्तर प्रदेश की सियासत में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव की यह नई रणनीति सपा को पहले की तुलना में अधिक सशक्त बना पाएगी या नहीं। इस समय उत्तर प्रदेश के दलित वोट बैंक पर सभी पार्टियों की नजर है, जो आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।